Sunday, September 26, 2021

कुकुरमुत्ता पार्टियां और कांग्रेस का प्रपंच

यूपी में अगले साल चुनाव हैं और हर चुनाव के समय तमाम पार्टियां कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हो जाती हैं। आज चर्चा उस कुकुरमुत्ता_पार्टी की जिसे हमारे यहां के गिद्ध टाइप बुद्धिभोजी और लिब्रान्डू मीडिया सेक्युलर बताते नहीं थकते हैं।

हम बात कर रहे हैं भारतीय मुसलमानों के स्वयंभू_खलीफा असद्दुदीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) की, जिसके नाम से ही जाहिर है कि यह पार्टी किनके लिये है और कितनी सेक्युलर को सकती है।

चलिये, इस सेक्युलर(?) पार्टी के बारे में कुछ तथ्य जान लेते हैं-

एआईएमआईएम की स्थापना आज से 92 साल पहले नवंबर 1927 में हुई थी। यह पार्टी हैदराबाद को एक आजाद इस्लामिक_रियासत के रूप में भारत से अलग करने की पक्षधर थी, संभवतः इसीलिये स्वतंत्र भारत में हैदराबाद रियासत का विलय होने के बाद आंध्र प्रदेश में यह पार्टी राजनीतिक दृष्टि से मृतप्राय हो गयी और इसे एक भी सीट नहीं मिली।

यह स्थापित सत्य है कि स्वतंत्रता के बाद लम्बे अरसे तक लगभग सम्पूर्ण भारत में कांग्रेस की ही राजनीति सत्ता रही, आंध्रप्रदेश में भी कांग्रेसी सरकारें ही बनती रहीं। फिर अकस्मात आंध्रप्रदेश की राजनीति में तेलगु फिल्मों के भगवान एनटीआर का उदय हुआ। उन्होंने 1982 में अपनी पार्टी तेलगुदेशम बनायी और कांग्रेस की जड़ें हिला दीं।

तब केंद्र में कांग्रेस सरकार थी और इंदिरा_गांधी प्रधानमंत्री थीं। दिसंबर 1982 के विधानसभा चुनावों में तेलगुदेशम ने कांग्रेस को पराजित कर दिया और 9 जनवरी 1983 को एनटी रामाराव आंध्रप्रदेश के पहले गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। इंदिरा ने अपनी चालें चलीं और अगस्त 1984 में एनटी रामाराव की सरकार गिरा दी गयी, आंध्रप्रदेश में फिर से चुनाव घोषित हो गये।

एनटी रामाराव लोकप्रियता के शिखर पर थे, जनता की सहानुभूति भी उनके साथ थी और चुनावों में कांग्रेस की हार तय थी। ऐसे में एक दिन अचानक इंदिरा गांधी हैदराबाद में एआईएमआईएम के दफ्तर पहुंच गयीं। असदुद्दीन ओवैसी के मरहूम अब्बाजान सलाहुद्दीन ओवैसी तब की मुर्दा एआईएमआईएम के अध्यक्ष थे। इंदिरा ने सलाहुद्दीन ओवैसी के साथ खाना खाया और एनटी रामाराव के विजय रथ को रोकने के लिये आंध्र प्रदेश के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में एआईएमआईएम के साथ गठबंधन किया।

इस गठबंधन से कांग्रेस को तो कोई फायदा नहीं हुआ, लेकिन एआईएमआईएम को पहली बार आंध्रप्रदेश में विधानसभा की 4 और लोकसभा की एक सीट पर जीत मिली। एनटी रामाराव भारी बहुमत से फिर आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री बने और अपना कार्यकाल पूरा किया।

एक मरी हुई देशविरोधी_पार्टी को कांग्रेस ने अपने कुकर्मों और निजी स्वार्थ की वजह से जिंदा कर दिया। जिस मरे_सांप को कांग्रेस ने जिंदा किया था, वही सांप अब कांग्रेस को डसने लगा है, तो कांग्रेसी बार-बार बिलबिला कर ओवैसी को बीजेपी का एजेंट बताने लगते हैं। उनके पिछवाड़े मारकर इंदिरा गांधी का कुकर्म याद जरूर दिलाइयेगा।

जय_हिन्द 🙏

Wednesday, September 8, 2021

कांग्रेस का रीढ़विहीन नेतृत्व बनाम भाजपा

ऐतिहासिक_तथ्य..

22 मई 2004 को देश के प्रधान पद से अटल_जी की अप्रत्याशित विदाई हुई। राजनीतिक दृष्टिकोण से यह कोई अभूतपूर्व घटना नहीं थी, परंतु उसके बाद देश में जो कुछ हुआ वह अविस्मरणीय अवश्य है।

अटल जी के बाद रीढ़विहीन नेतृत्व में रिमोट से चलने वाली कांग्रेसी_सरकारें केंद्र की सत्ता में आयीं जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि एक के बाद एक घाव भारतमाता को लगते रहे। स्मरण करिये-

1. 15 अगस्त 2004, असम के धीमाजी में ब्लास्ट 18 मृत/40 घायल
2. 5 जुलाई 2005, अयोध्या  5 मृत/26 घायल
3. 28 जुलाई 2005, जौनपुर RDX ब्लास्ट 13 मृत/50 घायल
4. 29 अक्टूबर 2005, दिल्ली सीरियल ब्लास्ट 70 मृत/250 घायल
5. 28 दिसंबर 2005, IIMS बंगलोर हमला 1 मृत/4 घायल
6. 7 मार्च 2006 वाराणसी में 3 बम धमाके, 28 मृत/104 घायल
7. 11 जुलाई 2006, मुंबई सीरियल ट्रेन ब्लास्ट 209 मृत/700 घायल
8. 8 सितंबर 2006, मालेगांव मस्जिद ब्लास्ट 37 मृत/125 घायल, (इसमें सिमी का हाथ था, लेकिन कांग्रेस ने इसे हिंदू आतंकवाद में बदला।)
9. 18 फरवरी 2007, समझौता ब्लास्ट 68 मृत/50 घायल, (इसमें लश्कर का हाथ लेकिन कांग्रेस ने इसे भी हिंदू आतंकवाद में बदलवाया।)
10. हैदराबाद मस्जिद ब्लास्ट, 16 मृत/100 घायल, (इसे भी कांग्रेस ने हिंदू आतंकवाद में बदलने की असफल कोशिश की।)
11. 14 अक्टूबर 2007, लुधियाना ब्लास्ट 6 मृत/22 घायल
12. 22 नवंबर 2007, यूपी के कई शहरों में ब्लास्ट 16 मृत/79 घायल
13. 1 जनवरी 2008, यूपी के रामपुर में CRPF कैंप ब्लास्ट 8 मृत/7 घायल
14. 13 मई 2008, जयपुर सीरियल ब्लास्ट 63 मृत/200 घायल
15. 25 जुलाई 2008, बैंगलोर ब्लास्ट 2 मृत/20 घायल
16. 26 जुलाई 2008, अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट 35 मृत/110 घायल
17. 13 सितंबर 2008, दिल्ली सीरियल ब्लास्ट 33 मृत/108 घायल
18. 27 सितंबर 2008, दिल्ली महरौली ब्लास्ट 3 मृत/33 घायल
19. 1 अक्टूबर 2008, अगरतला ब्लास्ट 4 मृत/100 घायल
20. 21 अक्टूबर 2008, इंफाल ब्लास्ट 17 मृत/50 घायल
21. 30 अक्टूबर 2008, असम ब्लास्ट 81 मृत/500 घायल
22. 26 नवंबर 2008, मुंबई आतंकी हमला 166 मृत/600 घायल
23. 1 जनवरी 2009, गौहाटी ब्लास्ट 6 मृत/67 घायल
24. 6 अप्रैल 2009, गौहाटी ब्लास्ट 7 मृत/62 घायल
25. 13 फरवरी 2010, पुणे जर्मन बेकरी ब्लास्ट 17 मृत/70 घायल
26. 7 दिसंबर 2010, वाराणसी सीरियल ब्लास्ट 3 मृत/36 घायल
27. 13 नवंबर 2011, मुंबई ब्लास्ट 26 मृत/126 घायल
28. 7 सितंबर 2011, दिल्ली हाईकोर्ट ब्लास्ट 17 मृत/180 घायल
29. 1 अगस्त 2012, पुणे ब्लास्ट मृत/घायल अज्ञात
30. 21 फरवरी 2013, हैदराबाद ब्लास्ट 18 मृत/131 घायल
31. 17 अप्रैल 2013, बंगलोर ब्लास्ट 14 घायल
32. 7 जुलाई 2013, बोधगया ब्लास्ट 6 घायल
33. 27 अक्तूबर 2013, पटना रैली में ब्लास्ट 8 मृत/85 घायल
34. 1 मई 2014, चेन्नई ट्रेन ब्लास्ट 2 मृत/14 घायल

इनके अतिरिक्त माओवादियों, नक्सलियों और कश्मीर आदि में आतंकियों द्वारा निरंतर घटनाएं की गयीं, उनमें मृत/घायलों के आंकड़े उपलब्ध ही नहीं हैं और बटला_हाउस जैसी घटनाएं भी हुईं जिसमें आतंकियों के मारे जाने पर कांग्रेसी_राजमाता को फूट-फूट कर रोना पड़ गया था।

आप भाजपा और मोदी के कितने भी विरोधी हों, लेकिन यह तो स्वीकार ही करना होगा (भले ही दिल पर पत्थर रख कर मानें) कि उनके प्रधान बनने के बाद आतंकी J&K से नीचे नहीं उतर पाये और 2014 के बाद से देश में कहीं भी कोई ब्लास्ट नहीं हुआ है।

तो.. हर बार सरकार चुनते समय सोचियेगा जरूर कि आपको आतंकियों की मौत पर रोने वाले चाहिये, या आतंकियों को उनकी मांद में घुसेड़ कर 72_सुअरों के पास दोजख में भेजने वाले चाहिये.?

जय_हिंद 🙏

Thursday, August 26, 2021

इस्लाम का गड़बड़झाला..

गजब का #गड़बड़झाला है..

अफगानिस्तान में मुसलमानों को कौन मार रहा है.?
सीरिया में मुसलमानों की हत्या कौन कर रहा है.?
यमन में मुसलमानों को कौन मार रहा है.?
इराक में मुसलमानों को कौन मार रहा है.?
लीबिया में, मिस्र में, सोमालिया में, बलूचिस्तान में और तमाम इस्लामिक देशों में मुसलमानों को कौन मार रहा है.?

क्या अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लेबनान, यमन और मिस्र, सोमालिया वगैरह को बजरंग_दल या हिन्दू_महासभा ने बर्बाद किया है.? या वहां दंगे करने के लिये आरएसएस के लोग गये थे.?    

75 साल पहले 1946 तक विश्व में इस्लामी देशों की संख्या सिर्फ 6 थी। आज मुस्लिम देश 57 हो गये हैं, लेकिन इनमें से किसी एक में भी आज मुस्लिम सुरक्षित नहीं हैं।

बताया तो यही जाता है कि इस्लाम एक शांतिपूर्ण धर्म है और आसमानी किताब के मुताबिक तो दुनिया भी इस्लाम के साथ ही पैदा हुई थी। लेकिन पता नहीं क्यों जैसे-जैसे इस्लाम बढ़ता गया, दुनिया से शांति रहस्यमय रूप से से गायब होती गयी।

बौद्ध+हिन्दू= कोई समस्या नहीं,
हिन्दू+ईसाई= कोई समस्या नहीं,
हिन्दू+यहूदी= कोई समस्या नहीं,
ईसाई+नास्तिक= कोई समस्या नहीं,
नास्तिक+बौद्ध= कोई समस्या नहीं,
बौद्ध+सिख= कोई समस्या नहीं,
सिख+हिन्दू= कोई समस्या नहीं..

लेकिन

मुस्लिम+हिन्दू= समस्या
मुस्लिम+बौद्ध= समस्या
मुस्लिम+ईसाई= समस्या
मुस्लिम+Jews= समस्या
मुस्लिम+सिख= समस्या
मुस्लिम+Baha'is= समस्या
मुस्लिम+नास्तिक= समस्या
मुस्लिम+Atheists= समस्या
और
मुस्लिम+मुस्लिम= सबसे बड़ी समस्या..

अगर मुस्लिम बहुसंख्यक है, तो न वह सुखी है न किसी को सुखी रहने देगा-

मुस्लिम गाजा में सुखी नहीं,
मुस्लिम Egypt में सुखी नहीं,
मुस्लिम लीबिया में सुखी नहीं,
मुस्लिम मोरोक्को में सुखी नहीं,
मुस्लिम ईरान में, इराक में सुखी नहीं,
मुस्लिम सीरिया, लेबनान में सुखी नहीं,
मुस्लिम नाइजीरिया में, केन्या में, सूडान में सुखी नहीं..
और मुस्लिम यमन में, अफगानिस्तान में, पाकिस्तान में सुखी नहीं..

मुस्लिम सुखी वहां हैं, जहां वह कम संख्या में है-

मुस्लिम सुखी है आस्ट्रेलिया में,
मुस्लिम सुखी है इंग्लैंड में,
मुस्लिम सुखी है बेल्जियम में,
मुस्लिम सुखी है फ्रांस में,
मुस्लिम सुखी है इटली में
मुस्लिम सुखी है जर्मनी में,
मुस्लिम सुखी है स्वीडन में,
मुस्लिम सुखी है USA में,
मुस्लिम सुखी है कनाडा में,
मुस्लिम सुखी है नार्वे में,
मुस्लिम सुखी है नेपाल में..
और मुस्लिम सुखी है भारत में..

दरअसल मुसलमान उन्हीं देशों में सुखी हैं जो इस्लामिक देश नहीं है, लेकिन विडम्बना यह है कि वो उन्ही देशों को लगातार दोषी भी ठहराते रहते हैं और वहां की लीडरशिप को बदलने की कोशिश में लगे रहते हैं। इसके लिये वह हर तरह के हथकंडे अपनाते हैं और उनकी आसमानी_किताब इन सभी जायज_नाजायज हथकंडों को जिहाद कहते हुए इसे परमिट भी करती है।

UNO के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार इस समय विश्व में 1687 इस्लामिक_आतंकवादी संगठन हैं, जिनके दम पर यह शांतिदूत दुनिया को बदलना चाहते हैं। टॉप 15 नमूने देखिये-

1. ISIS
2. अलकायदा
3. तालिबान
4. हमास
5. हिज्बुल मुजाहिदीन
6. बोको हरम
7. Al Nusra
8. अबू स्याफ
9. अल बदर
10. मुस्लिम ब्रदरहुड
11. लश्कर-ए-तैयबा
12. Palestine Liberation Front
13. Ansaru
14. जेमाह इस्लामिया
15.अब्दुल्ला आजम ब्रिगेड

क्या अभी भी समझाना होगा
कि असल समस्या कौन है और आतंकवाद_का_मजहब क्या है.?! 🤔

जानकारी_ही_बचाव है.. 🙏

Sunday, August 8, 2021

विपक्षी पार्टियां और राहुल गांधी का मंकी_एफर्ट..

एक बार जंगल में शेर के खिलाफ बगावत हो गयी, शेर से नाराज तमाम जानवर इकट्ठा हो गये और मौका अच्छा देख बन्दर उनका नेता बन गया। फिर जंगल में प्रचार होने लगा कि शेर अत्याचारी है और अब जंगल को बन्दर ही बचा सकता है.. 

फिर एक दिन शेर_विरोधी मार्च तय हुआ और सभी शेर विरोधी पोस्टर बैनर लेकर इकट्ठा हुए। तभी वहां शेर आ गया। जानवर डर गये और बंदर से बोले- "तुम हमारे नेता हो, हमें शेर से बचाओ.!" बन्दर भी पेड़ पर चढ़ कर इस डाल से उस डाल कूद-कूद कर खों-खों करने लगा, शेर चुपचाप मजे लेता रहा.! शेर के जाने के बाद जंगल के जानवरों ने बंदर से पूछा- "तुमने कुछ किया क्यों नहीं.?" बंदर ने ऐतिहासिक उत्तर दिया- "डाल-डाल कूद कर मैंने कितनी कोशिश की थी, मेरे एफर्ट में कोई कमी थी क्या.?"

भारत का विपक्ष भी लगातार मृतप्राय_कांग्रेस और वयस्क_बालक राहुल_गांधी के भरोसे कभी राफेल, कभी CAA और NRC, कभी एवार्ड वापसी, कभी किसान आंदोलन और अब पेगासस जैसे मंकी_एफर्ट्स से मोदी को हटाना चाह रहा है। विपक्ष समझ ही नहीं पा रहा है कि-

मुस्लिम_वोट_बैंक में दम होता, तो मई 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री न बने होते..
नफरत से भरे मुट्ठीभर_लेखकों और कवियों को मई 2014 के बाद विलाप भाव की कविता का पाठ करते हुए एवार्ड_वापसी और देश छोड़ने का ऐलान न करना पड़ता..
राफेल में दम होता, तो फिर 2019 में नरेंद्र मोदी दुबारा प्रधानमंत्री न बने होते..
NRC और CAA के दंगों में दम होता, तो किसान आंदोलन न होता..
और किसान_आंदोलन में दम होता, तो अब पेगासस जैसी बासी_कढ़ी फिर से न उबाली जा रही होती.. 

मेरे विचार से नरेंद्र_मोदी_वार्ड में भर्ती विपक्ष के सारे मरीजों को समझ लेना चाहिये कि मंकी_एफर्ट्स से देश की छवि खराब करते हुए अपना ईगो_मसाज तो किया जा सकता है, पर नरेंद्र मोदी जैसे जननायक को बानरी उछल कूद से पछाड़ पाना संभव नहीं है।   

चंद मुस्लिम वोटों के लिये "भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्ला, इंशा अल्ला.." या "तुम कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा.." की मानसिकता में डूबे विपक्ष की पुलवामा में आतंकी कार्रवाई को भी मोदी की साजिश मानना, मोदी विरोध के उफान में चीन को अपना बाप मान लेना, सर्जिकल_स्ट्राइक और एयर_स्ट्राइक को फर्जी बताकर सबूत मांगना, अभिनंदन की वापसी को भी तिकड़म मानना.. सेना, सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग सहित हर संवैधानिक_संस्था व जनता को भी भक्त तथा भाजपाई घोषित कर देना और कोरोना_काल में भी देश को गृहयुद्ध में झोंकने की कोशिश करना उसे निरंतर रसातल में ही ले जा रहा है।

अब देश ही नहीं, देश की राजनीति भी आमूल-चूल बदल चुकी है और जनता ने अपनी प्राथमिकताएं भी बदल ली हैं। जनता अब अपनी जरूरतें भी जानती है और अपनी महत्वाकांक्षाएं भी। तो उचित होगा कि सम्पूर्ण विपक्ष और कांग्रेस भी राहुल के मंकी_एफर्ट के खेल से बाहर निकल कर जमीनी स्तर पर जनता के बीच नहीं जाये और सकारात्मक राजनीति करे नहीं तो गगन_विहारी विपक्ष तो लगातार मोदी को और अधिक मजबूत ही बनाता दिख रहा है और 2024 में भी नरेंद्र का कुछ बिगाड़ पायेगा, ऐसा सम्भव नहीं लग रहा है।

🚩🇮🇳 #जय_हिंद 🇮🇳🚩

Thursday, July 15, 2021

पीर की हरी_चादर और खौफजदा_हिन्दू..

आपमें से बहुतों ने किसी न किसी पीर या ख्वाजा की मजार पर हरी_चादर या उसपर पैसे जरूर चढ़ाये होंगे, ये न भी किया हो तो मोहल्ले में घूमते लम्बे_कुर्ते और छोटे_पाजामे वालों की हरी_चादर पर सिक्के तो जरूर ही डाले होंगे। मैं भी पत्नीजी के दबाव में जयपुर जाकर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती उर्फ गरीबनवाज की मजार पर चादर चढ़ाने में उनका सहयोग कर चुका हूं। उस कथा और उसके निहितार्थ पर चर्चा फिर कभी.. फिलहाल पीर, ख्वाजा और सैयद की बात करते हैं।

क्या जानते हैं आप, हम या कोई सामान्य हिन्दू इन पीर, ख्वाजा या सैयद के बारे में.? क्या हमें इन शब्दों के अर्थ या इनकी उत्पत्ति के बारे में भी पता है.? जानिये और समझिये..

भारतवर्ष के लगभग 250 वर्षों के मुस्लिम गुलामी काल में पीर वह राजस्व_अधिकारी होता था, जिसके जिम्मे हिन्दू गावों से लगान और टैक्स (जजिया वगैरह) आदि वसूलने का काम होता था। यह महत्वपूर्ण पद था, पीर की सुरक्षा व्यवस्था इतनी तगड़ी होती थी कि कोई भी उसके 9 गज से करीब नहीं आ सकता था और गांव वालों को नियत स्थान पर पीर के सामने जाकर टैक्स की रकम या सामान रख देना होता था।

जो हिन्दू परिवार टैक्स देने में असमर्थ रहते थे, पीर के सुरक्षा कर्मी उनके परिवार की सबसे सुंदर बहू या बेटी को नंगा करके लाते थे और पूरे गांव के सामने उसके साथ बलात्कार किया जाता था ताकि फिर कोई भी टैक्स देने से मना करने की हिम्मत न करे। इस घिनौने बलात्कार के बाद उस बहू बेटी के नंगे_बदन पर चादर डाल दी जाती थी और गांव के बाकी लोगों को लगान व टैक्स का पैसा उसी चादर पर डालना होता था।

पीर से ज्यादा अधिकार और क्षेत्रफल ख्वाजा के पास होता था, वह पीर से भी ज्यादा अत्याचार लूटखसोट करता था। ख्वाजा से भी ज्यादा अधिकार सैय्यद को मिले होते थे। 

धीरे-धीरे यह प्रथा बन गयी। फिर पीर, ख्वाजा या सैयद जब भी किसी हिन्दू गांव में वसूली के लिये जाते, तब पहले ही उनके लिये गांव की सुंदर हिन्दू लड़कियां और बहुएं छांट कर रखी जाती थीं। वह उनके साथ बलात्कार करते फिर उनके नंगे_शरीर पर चादर बिछा दी जाती थी, हिन्दू जनता उसी चादर पर टैक्स की रकम डाल देती थी..

सौभाग्य से अब वो कुकर्मी पीर, ख्वाजा या सैयद नहीं रहे.. लेकिन हम मूर्ख और अज्ञानी_हिन्दू आज भी न जाने किस खौफ में अपनी बहन-बेटियों की इज्जत लूटने वाले उन्हीं नीचों की कब्रों पर माथा रगड़ते फिरते हैं और उनकी चादरों पर पैसा चढ़ा रहे हैं।

कायरता_और_मूर्खता की इससे बड़ी मिसाल अगर दुनिया में कहीं और मिले, तो प्लीज मुझे भी बताइयेगा.. 😡

नोट: यह लेख बीकानेर_संग्रहालय में संचित मुगलकालीन पांडुलिपियों में अंकित तथ्यों पर आधारित है।

Monday, July 12, 2021

लिबरल समाज और मासूम_भेड़िया..

पति-पत्नी जंगल से गुजर रहे थे। अचानक पत्नी की दृष्टि सड़क पर घायल पड़े एक जानवर के बच्चे पर पड़ी, उसने कार रुकवा दी और दोनों बाहर आ गये।

पत्नी बोली ने उसे पानी पिलाया तो शावक में थोड़ी जान आयी। पत्नी बोली- "यह तो कुत्ते का बच्चा है, इसे साथ ले चलते हैं। हमारे दोनों कुत्तों के साथ ही रह लेगा.." पति ने कहा- "शहर से दूर इस जंगल में कुत्ता कहां से आयेगा.? यह भेड़िये का बच्चा है, इसे छोड़ो और कार में बैठो.." पत्नी अड़ गयी कि यह कुत्ते का ही बच्चा है और उसे अपने घर ले आयी।

अच्छे खान-पान से थोड़े ही दिन में भेड़िये का बच्चा मोटा-तगड़ा हो गया। कुछ दिनों बाद ही दंपति का एक कुत्ता घर से गायब हो गया, उसकी हड्डियां घर के पीछे मिलीं और भेड़िये के बच्चे के मुंह में खून लगा मिला। पति बोला- देखा, मैंने कहा था न कि यह भेड़िये का बच्चा है.? इसने हमारे कुत्ते को मार डाला.!" पत्नी बोली- "दोनों कुत्ते पहले दिन से ही इससे चिढ़ते थे, इस बेचारे ने अपने बचाव में ही ऐसा किया होगा.!" पति चुप हो गया.. 

कुछ दिनों बाद दूसरा कुत्ता भी गायब हो गया। पति ने फिर भेड़िये के बच्चे पर शक जताया, पत्नी फिर उसके समर्थन में आ गयी। घर में झगड़े होने लगे और पड़ोसी भी बोलने लगे कि मोहल्ले से भेड़िये को भगाओ, लेकिन पत्नी मानने को तैयार ही नहीं थी।

फिर एक दिन उन पति-पत्नी का अपना एक बच्चा भी गायब हो गया, अब पति अड़ गया कि इसे घर में नहीं रहने दूंगा। पत्नी नहीं मानी और दोनों में तलाक हो गया, पत्नी अपने दूसरे बच्चे और भेड़िये को लेकर मायके आ गयी। कुछ दिनों के बाद भेड़िया उसके दूसरे बच्चे को भी खाकर भाग गया। अब पत्नी भेड़िये को खोजने निकल पड़ी, लोगों ने कहा- "पहले तो हमारी बात मानी नहीं, अब उसे खोज कर क्या करोगी.?"

पत्नी बोली- "मैं उस भेड़िये को #माफी मांगने के लिये ढूंढ़ रही हूं। अगर मेरे पति और दोनों कुत्तों ने उस मासूम से इतनी नफरत न की होती, तो बेचारे को मानव_मांस खाने को मजबूर न होना पड़ता.."

हम आज भी तथाकथित गांधीवादियों और लिबरलों के चक्कर में भेड़ियों_से_मुहब्बत और अपनों_की_अनदेखी कर रहे हैं। लेकिन याद रखिये कि भेड़िये कभी भी अपना धर्म, अपना चरित्र नहीं बदलते.. वो खूनी होते हैं और खूनी ही रहेंगे..!

नोट: इस कथा का आतंकवाद_के_धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है.. 😐

Friday, July 9, 2021

प्रायोजित लव_जिहाद और हिन्दू_मुर्गियां..

पिछले दिनों लगभग सारे भारतीय मीडिया ने आमिर_खान और किरन_राव के तलाक का महिमामंडन करते हुए ऐसे दिखाया, जैसे यह कोरोना_वैक्सिनेशन से भी बड़ी खबर है। एक वर्ग ने इनसे सहानुभूति दिखायी और अति उत्साही राष्ट्रवादियों ने लव_जिहाद कहकर इसकी भर्त्सना की..

मेरी दृष्टि में आमिर खान और किरन राव का मामला केवल लव जिहाद का नहीं है। किरन राव कभी भी न तो इसमें फंसी थी, न ही अब इससे मुक्त हुई है। वास्तव में यह पूरा घटनाक्रम शुरु से ही आमिर खान का एक प्रायोजित_कार्यक्रम था और किरन राव इसमें बस अपना रोल_प्ले कर रही थी। 

किरन को आगे करके आमिर ने पहले लव_जिहाद को प्रमोट किया, फिर सरोगेसी को और अब 30 करोड़ में उसे तलाक देकर तलाक को प्रमोट कर रहा है। यह फिल्मी लोग कोई भी प्रमोशन फ्री में नहीं करते और भारत में इस टाइप के प्रमोशन के लिये तो आधी दुनिया के शांतिदूत खजाना खोले तैयार रहते हैं। वैसे सभी को मेहनताना देने के बाद भारी-भरकम बजट वाली इस प्रायोजित_फिल्म की शूटिंग फिलहाल खत्म हो गयी है।

कटु सत्य यह भी है कि ऐसे फिल्मी निकाह या तलाक से कभी भी किसी शर्मिला_टैगोर, अमृता_सिंह, करीना_कपूर या किरन_राव को ज्यादा दिक्कत नहीं होती। इस घटिया प्रमोशन से असल दिक्कत होती है इनकी देखा-देखी किसी आमिर पर भरोसा कर लेने वाली गांव_देहात की किरनों को। उनकी स्थिति उस मुर्गी जैसी होती है जिसे अंडे देने तक तो रोज बढ़िया पौष्टिक दाने खिलाये जाते हैं और अंडे देने बन्द करने के बाद मालिक काटकर उसका मांस भी बेंच देता है। 

इन फिल्मी कहानियों को सच मानकर इस जिहाद में फंसी इन बेचारी किरनों का मांस तो बिकेगा नहीं, तो ऐसी आम हिन्दू लड़कियों को आखिरी पनाह टुकड़ों में कटकर बोरी या सूटकेस में ही मिलती है। पैसों के लिये फिल्मी शूटिंग की तरह निकाह और तलाक का ढोंग करती है कोई किरन राव, पर उसका दण्ड भोगती है कोई नैना मंगलानी, कोई शिल्पी, कोई उषा, कोई सरिता या कोई और...

इस घिनौने प्रायोजित खेल को रोकने का एकमात्र तरीका यही है कि हम अपनी बच्चियों को अपने धर्म, अपनी परम्पराओं की शिक्षा दें, परिवार का महत्व बतायें और समझायें कि किससे प्रेम किया जाना चाहिये और किससे घृणा करनी चाहिये..

जी हां.. प्रेम की तरह घृणा भी जीवन का एक अनिवार्य भाव है और अब स्वीकार करना ही होगा कि पाप से घृणा करने के साथ-साथ पापी से घृणा करना भी ज्यादा जरूरी है..

जय_हिन्द