Wednesday, May 20, 2020

हम मजबूर हैं, मजदूर नहीं..

वर्तमान प्रवाह से थोड़ा भिन्न है, पूरा पढ़ने के बाद ही टिप्पणी अपेक्षित है..

पिछले करीब 6-7 हफ्ते से (जब से लाकडाउन शुरू हुआ और दिल्ली सरकार ने अचानक सारे श्रमिकों को दिल्ली से बाहर कर बॉर्डर पर खड़ा कर दिया था), सारे न्यूज चैनल, सोशल मीडिया और हर कहीं एक ही बात की चर्चा है- मजदूर..बस प्रवासी मजदूर..

अब तो ऐसा लगने लगा है कि भारत सिर्फ मजदूरों का देश है और यहां सारी समस्याएं व समाधान इन्हीं से होता है। 

अब कोई मजदूर क्यूं बनता है और फिर उसके बाद प्रवासी मजदूर क्यूं बन जाता है, यह बड़ा जटिल विषय है, इसपर चर्चा फिर कभी। अभी तो मैं इस आग्रह के साथ आया हूं कि देश में इन मजदूरों के अलावा भी और लोग रहते हैं और उन सबकी भी कुछ दिक्कतें-समस्याएं हैं। कृपया उनपर भी ध्यान दें क्योंकि इन मजदूरों के लिये तो सब लगे हैं और एक पार्टी तो पिछले दिनों इनके चक्कर में अपनी ऐतिहासिक नाक भी कटवा चुकी है। 

तो..अब मजदूर अपने घर पहुंच भी जायेगा और मनरेगा जाब कार्ड, राशनकार्ड, मुफ्त के चावल, दाल,  आटा और जनधन खाते के मुफ्त 2000 रुपयों में जी-खा भी लेगा..

अब सोचिये उसके बारे में..

जिसने लाखों का कर्ज लेकर प्राईवेट कालेज से इंजीनियरिंग, एमबीए और डिप्लोमा किया था और बड़ी मुश्किल से किसी प्राइवेट कम्पनी में 8-10 हजार की (ध्यान दीजियेगा, यह मजदूर की कुल मासिक आमदनी से कम ही है) नौकरी पायी थी। या वह जिसने अभी नयी-नयी वकालत शुरू की थी (दो-चार साल तक वैसे भी कोई Client नहीं मिलता, मुश्किल से चार-पांच हजार महीने में हो पाते हैं, वह भी सीनियर की कृपा से)..या वह जो तमाम प्रोफेशनल डिग्री लेकर सेल्स मैनेजर, एरिया मैनेजर (भले ही महीने में 12 हजार ही मिलता हो) का तमगा लिये घूमता था। आप कार या बाइक की एजेंसी पहुंचे नहीं कि लोन दिलाने से लेकर होम डिलीवरी तक के लिये मुस्कुराते हुए बिजनेस सूट में आपके सामने हाजिर..

मैंने (और शायद आपने भी) ऐसे बहुत से  वकील, इंजीनियर, पत्रकार और एजेंट देखे होंगे..अंदर भले ही चड्ढी फटी हो, लेकिन बाहर अपनी गरीबी का प्रदर्शन ये नहीं कर सकते। इनके पास न तो मुफ्त में चावल पाने वाला राशन कार्ड है, न ही जनधन का खाता। देशभक्ति के जोश में गैस की सब्सिडी भी ये छोड़ चुके हैं। ऊपर से (स्टेटस मेंटेन करने के चक्कर में) लोन पर मोटर साइकिल या कार भी ले लिये हैं, तो उसकी किश्त भी देनी होती है ब्याज सहित..और अगर बेटी-बेटा स्कूल जा रहे हैं (सरकारी स्कूल में तो भेजेंगे नहीं, स्टेटस का सवाल है) तो उनकी एक महीने की फीस (बिना स्कूल भेजे ही) उतनी देनी है, जितने में दो लोगों का परिवार महीने भर मजे से खा सकता है। बाकी हारी-बीमारी आ जाये तब तो (इलाज भी तो प्राइवेट में ही कराना है) भगवान ही मालिक है।

अब आज के माहौल में यह वर्ग क्या करे.? फेसबुक पर अपना दर्द भी नहीं लिख सकता (बड़ा आदमी है न), तो बेचारा मनभावन विषय "मजदूर की त्रासदी" पाकर उनकी पीड़ा के नाम पर (वस्तुतः अपनी ही) पीड़ा व्यक्त कर दे रहा है, बिना किसी सहानुभूति की अपेक्षा किये..

यह कटु और निर्मम सत्य है कि IAS और PCS का सपना लेकर रात-रात भर जाग कर पढ़ने वाला छात्र बहुत पहले ही प्रयागराज, दिल्ली और कोटा जैसे शहरों से पैदल ही निकल लिया था, मजदूर के वेश में अपनी पहचान छिपाते हुये.. क्योंकि बहुत पढ़ने के बाद भी वह अपनी गरीबी और "मजबूरी की दूकान" सजाना नहीं सीख पाया था..
तो..थोड़ा ही सही, इनके बारे में भी सोचिये.. 🤔😥
जयहिंद

Friday, January 31, 2020

भटका हुआ गोपाल

कोई #भटका_हुआ_लड़का है, गोपाल! कहीं भीड़ की ओर नली कर के कट्टा दाग दिया है। यूपी का हूं, तो कट्टे की औकात भी बचपन से जानता हूं कि बीस फीट दूर से इससे आदमी क्या चिड़िया भी नहीं मरेगी।

लेकिन देख रहा हूं कि कुछ लोग बहुत भड़के हुए हैं। ये वही लोग हैं जिन्होंने दो सौ लोगों के हत्यारे के लिए आधी रात को कोर्ट खुलवाया था। जिस देश में रोज ही सैकड़ों हत्याएं होती हों, वहां के लिये यह घटना बहुत बड़ी नहीं है, फिर भी इसबार मैं अंदर से कांप गया हूं।

यह किसी एक गोपाल की बात नहीं है, असल में अब #इधर_के_लड़के भी भटकने लगे हैं, यह सोचने वाली बात है। क्योंकि हम कभी भटकने के लिये नहीं जाने गये। हम जाने गये राष्ट्र पर बलि चढ़ने के लिये, हम जाने गये सेवा के लिये, सद्भाव के लिये, स्नेह के लिये, बसुधैव कुटुम्बकम की भावना के लिये..हम जाने गए माता पद्मावती के लिये, बाबा प्रताप के लिये, गौतम के लिये, महाबीर के लिये..हमें गढ़ा था शबरी के राम ने, हमें रचा है सुदामा के कृष्ण ने..फिर हम कैसे भटक सकते हैं?

पर रुकिये, तनिक खोजिये कि यह भटकने का सिलसिला आखिर हमतक पहुंच कैसे गया.? वो कौन हैं वे जिन्होंने भटकने को फैशन बना दिया.? वे कौन लोग हैं जो कल तक हर आतंकवादी को #भटका_हुआ_नौजवान कहकर उसके साथ खड़े हो जाते थे.?

चार दिन नहीं हुए, जब उसी भीड़ को सम्बोधित करते हुए किसी ने देश तोड़ने की खुलेआम प्लानिंग की थी। क्या हुआ.? दो दिन बाद ही #रब्बिश जैसे लोग उसके समर्थन में खड़े हो गये और नेशनल चैनल पर खुलेआम झूठ बोलने लगे कि अरेस्ट नहीं हुआ है, सरेंडर किया है। उसे देशभक्त बताया जाने लगा..

इस देश का एक बड़ा शायर राहत इंदौरी सरेआम चुनौती देते हुए कहता है- "सच में आतंकवादी हो जायें तो क्या होगा.?" कोई उसका विरोध नहीं करता, बल्कि उसे बुद्धिजीवी कहा जाता है। कैसे न बिगड़ें लड़के.?

चालीस वर्षों से पार्टी का झोला ढ़ो रहे लोग टिकट के लिए तरसते रह जाते हैं और #कन्हैया जैसे चार दिन के लौंडे #भारत_विरोधी नारे लगा कर देश भर में चर्चित हो जाते हैं, तो नये लड़के कैसे नहीं भटकेंगे.?

ठीक से देखिये लड़के को, उसके चेहरे पर डर साफ दिख रहा है। यह वो लड़के हैं, जो यह सोच कर डरे हुए हैं कि जब कुछ #औरतें मिल कर राजधानी की एक मुख्य सड़क को महीनों तक बन्द कर सकती हैं तो #पुरुष मिल कर क्या नहीं करेंगे.? यकीन कीजिये, उस लड़के की हरकत भले नाजायज हो, उसका डर #जायज है। कौन हैं वे लोग, जो उसके मन मे डर भर रहे हैं.?

हमारा गोपाल ऐसा नहीं था, हमारे गोपाल की तो #दुनिया दीवानी है। लेकिन याद रखिये, जब आप लगातार एक हिस्से के उपद्रवियों का समर्थन करेंगे तो कभी न कभी दूसरे हिस्से में भी वैसे लोग खड़े होंगे ही होंगे, इसे कोई रोक नहीं सकेगा। उस कट्टे के #विकृत_स्वर की हम-आप चाहे जितनी निंदा कर लें लेकिन अंततः वह प्रतिरोध का ही एक स्वर है जिसके लिये सिर्फ और सिर्फ तुम लोग ही जिम्मेवार हो मेरे देश के #बुद्धिभोजियों..

इसलिये..अब मेरे देश पर दया करो और आतंक को फैशन न बनाओ। हां..हम शांति से जीने वाले लोग हैं और शांति से ही जीना चाहते हैं। हमें शांति से जीने तो दो..

Friday, January 10, 2020

रज्जो की शिकंजी और फिल्मी नचनिये..

JNU में वामी चाचा-चाचियों की चकाचक धुलाई के बाद मुम्बई के सेलिब्रिटीज सक्रिय हैं, कुछ JNU तक भी पहुंचे और बाकी भी अलग-अलग फोरम पर अपने-अपने राग गा रहे हैं। पूरा सोशल मीडिया इनके पक्ष-विपक्ष में खुलबुला रहा है..

इन सब पर बाद में, पहले एक किस्सा सुन लीजिये-

एक गांव में रज्जो नाम की एक महिला रहती थी जो नींबू-चीनी का शर्बत शिकंजी बहुत ही अच्छा बनाती थी। गांव में कोई भी आयोजन हो..शादी विवाह, जन्मदिन या पूजा-पाठ, भंडारा..
रज्जो की शिकंजी हर उत्सव की शान थी।

धीरे-धीरे रज्जो प्रसिद्ध हो गयी और गांव वालों ने उसे गांव का मुखिया बना दिया।

अब, मुखिया बनने के बाद जिम्मेदारी भी आ गयी। लोग-बाग रज्जो के पास अपनी समस्याएं लेकर आते, रज्जो सबको बहुत प्यार से शिकंजी पिलाया करती थी।

एक बार बहुत तेज बारिश हुई और लगभग आधा गांव डूब गया। लोग घबरा कर अपनी मुखिया रज्जो के पास आये और उसे स्थिति की गंभीरता के बारे में बताया, रज्जो ने भी पूरी गंभीरता से उन सबकी बात सुनी। उस दिन उसने ढेर सारी शिकंजी बनायी थी, वह सबको शिकंजी पिलाने लगी..

गांव वाले बहुत गुस्सा हो गये और बोले-  

"यहां हम सबकी जान पर पड़ी हुई है और तुम हमें शिकंजी पिला रही हो.? तुम स्थिति की गंभीरता को क्यों नहीं समझती.?"

"मैं स्थिति की गंभीरता समझ रही हूं, तभी तो आज मैंने इतनी ज्यादा शिकंजी बनायी है.!" रज्जो गंभीरता से बोली। "अब मुझे यही काम आता है, तो मैं वही कर रही हूं। मैंने तो ये आपलोगों से कभी नहीं कहा कि आप मुझे आइकॉन मानो और मुखिया बना दो। आप सबने खुद से मुझे आइकॉन बना रखा है, इसमें भला मेरा क्या दोष है.?"

यही स्थिति आज हमारे देश की भी है। जिन्हें हम अंग्रेजी में सेलिब्रिटी या हीरो_हीरोइन कहते हैं, उस कैटेगरी के लोगों को आज भी गांव-देहात में नचनिया, और भांड कह कर पुकारा जाता है। उनका काम सिर्फ और सिर्फ नाच-गा कर हमारा मनोरंजन करना होता है जिसके बदले में हम उन्हें बख्शीश के तौर पर कुछ पैसे दे देते हैं, इन अंग्रेजी सेलिब्रिटीज को भी हम टिकट के तौर पर पैसों की बख्शीश ही देते हैं।

यह इनका पेशा है, वह इसी की कमाई खाते हैं। और अगर आपके पास उन्हें देने के लिये भरपूर पैसा है, तो आप उन्हें अपने घर की शादी, जन्मदिन या किसी भी फंक्शन में इन्हें अपने घर पर- बेडरूम में भी- बिना कपडों के नचवा सकते हैं..बस बख्शीश दमदार होनी चाहिये..

ऐसे नचनियों और भांडों को अगर हम-आप अपना आइकॉन मानते हैं, तो इसमे उनका क्या दोष.? बलिहारी तो हमारी अपनी बुद्धि की है न.?

आइकॉन..आइकॉन बोल कर हमीं ने इन्हें इतना सर चढ़ा लिया है कि KBC में जो नचनिया देश की महिला राष्ट्रपति का नाम तक नहीं बता पाई थी और अभी CAA वाले मैटर में जो भांड यह तक नहीं बता पाया कि CAA है क्या और वह इसका विरोध क्यों कर रहा है.? वह भी ज्ञान बांटते फिर रहे हैं।

इसलिये, स्वयं पर कृपा करिये और इन नचनियों और भांडों को सीरियसली लेना बन्द कीजिये.. क्योंकि इनकी अपनी कोई आइडियोलॉजी नहीं होती है, पैसे देकर इन्हें कोई भी कहीं भी बुला सकता है।

हमारा देश ऐतिहासिक रूप से अत्यंत समृद्ध है। अपना हीरो_आइकॉन मानने के लिए हमारे पास राम, कृष्ण, अर्जुन से लेकर राणा सांगा, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, विवेकानंद, सुभाष चंद्र बोस , भगत सिंह, वीर सावरकर जैसे हजारों_हजार आइडल हैं।

इन सब को छोड़कर अगर फिर भी हम इन फिल्मी नचनियों और भांडों को अपना आइडल मानते रहेंगे तो फिर शायद भगवान भी हमारा भला नहीं कर पायेंगे।

Saturday, December 14, 2019

अफजल का गम

"तुम कितने अफजल मारोगे.? हर घर से अफजल निकलेगा..." सच कहा था उन्होंने।

इस समय मीडिया, सोशलमीडिया हर कहीं न जाने कितने वक्तव्य और वीडियो उड़ते-तैरते दिख रहे हैं जिनमें अनगिनत अफजल भारत की अस्मिता और संस्कृति को खुलेआम चुनौती दे रहे हैं। कहीं ट्रेन पर पत्थर फेंके जा रहे हैं, कहीं स्कूल कालेज तोड़े जा रहे हैं तो कहीं फसलें जलायी जा रही हैं। कल जो अफजल लोकतंत्र के मंदिर पर गोलियां बरसा रहा था, वही अफजल आज देश के अलग-अलग हिस्से में तोड़फोड़-आगजनी कर रहा है।

अगर आप को लगता कि अफजल CAB 2019 से नाराज होकर सड़क पर उतरा है, तो यकीन करिये आप या तो मानसिक विकलांग हो चुके हैं या फिर आपने भी अपनी आंखों पर लिबरल चश्मा चढ़ा लिया है।

अफजल तो 2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद राष्ट्रवादियों की सरकार बनने के बाद से ही हैरान-परेशान है। क्योंकि वह सड़क पर खुलेआम गाय नही काट सकता। अफजल गमजदा है, क्योंकि उसकी मर्जी के खिलाफ ट्रिपल तलाक को बैन कर दिया गया। अफजल बौखलाया है, क्योंकि कश्मीर से धारा 370 और 35A हटा दी गयी और अफजल गुस्से में है, क्योंकि वो चाहकर भी सुप्रीम कोर्ट के राममंदिर के पक्ष मे दिये गये निर्णय के विरोध में कुछ नहीं कर सकता।

अफजल के लिये CAB_2019 तो सिर्फ एक बहाना है। उसका असल मकसद तो उसकी अनचाही मौजूद सरकार को अपनी धमक/ताकत दिखाना है। याद करिये, जब अफजल ने लोकतंत्र के मंदिर संसद पर गोलियां चलायीं थीं, तब भी यही सरकार थी। अब CAB_2019 के बहाने अफजल अपने उस पुराने रसूख को पाना चाहता है जो उसे बाबर, अकबर, औरंगजेब, गौरी, इब्राहीम लोधी और जिन्ना ने दिया था। जिस रसूख से वो आजाद भारत में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय (शाहबानो केस) को भी बदलवाने का दम रखता था।

अफजल जानता है कि नागरिकता संशोधन बिल 2019 से देश के किसी मुसलमान की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, उसे हिन्दुस्तान से निकाला नहीं जायेगा। उसे बखूबी पता है कि नागरिकता संशोधन बिल पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के पीड़ित अल्पसंख्यको को सुरक्षित स्वदेश वापस लाने के लिये ही है और इन तीनों देशों में कुल मिलाकर भी मुठ्ठी भर ही हिन्दू या अल्पसंख्यक बचे हैं, जिनके भारत आ जाने से न तो अब्दुल कलाम सरीखे मुसलमान का घर छिनेगा न ही रोजगार।

लेकिन, अफजल ये भी जानता है कि अभी नहीं तो कभी नहीं..

अगर आज उसने औरंगजेब की तरह तोड़फोड़ नहीं मचायी, तो छत्रपति शिवाजी और महाराणा प्रताप की भूमि पर उसकी आतंक की बादशाहत हमेशा के लिये खत्म हो जायेगी। हिन्दुस्तान की सियासत में उसकी हैसियत मिट जायेगी जिसका असर सारी दुनिया पर होगा क्योंकि उसकी पैदाइश ही हिंसा से हुई है और अबतक सारी उपलब्धियां भी उसने लोगों को डराकर मार-काट के दम पर ही हासिल की हैं।

पर शायद अफजल कुछ भूल रहा है। वह भूल रहा है कि राणा प्रताप और शिवाजी के वंशजों का धैर्य अब खत्म हो चला है। वह भूल रहा है कि भारतीय जनमानस अब जान चुका है कि आजादी सिर्फ गांधी के चरखे से ही नहीं मिली थी, उसमें चंद्रशेखर आजाद और सुभाष चंद्र बोस सरीखों की गोली का भी योगदान था। अफजल भूल रहा है कि अब देश में राष्ट्रवादी सरकार है, जिसका नेतृत्व कुशल और सबल चाणक्य बुद्धि के पास है।

और..

अफजल भूल रहा है कि गोधरा Action नहीं था, सिर्फ ReAction था..😡

Thursday, November 7, 2019

न्यायमन्दिर के पंडे

मैं स्वभाव (और अपनी सेवा प्रवृत्ति से भी) पुजारी टाइप का नहीं हूं, लेकिन ईश्वरकृपा से देश और आसपास लगभग हर देवस्थान के दर्शन कर चुका हूं।

प्रायः हर कहीं मैंने भारतीय वर्णव्यवस्था के इतर एक अलग-'पंडा बिरादरी'-(आप सबको भी दिखी ही होगी) देखी है। देवदर्शन के पहले चाहे-अनचाहे भी आपको इन 'पंडों' को चढ़ावा चढ़ाना ही होगा, नहीं तो आपको देवदर्शन दुर्लभ ही हो जायेगा।

मगर यह भी एक सच्चाई है कि यह पंडा बिरादरी अपने को देवता के भक्तरूप में ही प्रस्तुत करती है, कभी भी स्वयं के देवता होने का दम्भ नहीं भरती है।

दुर्भाग्य से आजकल हमारे 'न्यायमन्दिरों' में 'पंडे' स्वयं को 'देवता' मान बैठे हैं और जिन मंदिरों की 'दान दक्षिणा' से उनके उदर, 'लंबोदर' होते जा रहे थे.. उन्हीं की मर्यादा खंडित करने पर उतारू हैं।

ईश्वर रक्षा करे इन ''पंडा पोषित मंदिरों'' की..

ऊँ शांतिः

Tuesday, November 5, 2019

दिल्ली पुलिस बनाम विधि व्यवसायी

दिल्ली #पुलिस_बनाम_वकील प्रकरण अब भयावह होता जा रहा है। कानून से सीधे सीधे जुड़ी (और कहीं न कहीं एक दूसरे की पूरक) दो संस्थायें आपस में उलझी हैं और जनता मूकदर्शक है (हमेशा की तरह)..

पुलिस वाले और वकील दोनों ही हमारे घर से हैं, आपके घर से भी हो सकते हैं। ये समझना जरूरी है कि यह आपस में क्यों उलझ गये.?

यह सच्चाई है कि भारत के हर न्यायालय परिसर में काले कोट वालों की संगठित गुंडई चलती है। इनकी तमाम यूनियन (बार काउंसिल) हैं और अगर व्यक्तिगत कारणों से भी कोई किसी वकील से लड़ पड़े तो उसे प्रोफेशन पर हमला बताते हुए ये संगठन सड़कों पर उतर आते हैं। दूसरी ओर पुलिस कर्मियों के पास ऐसा कुछ भी नहीं है, उनके तो उच्चाधिकारी भी (पता नहीं किन अज्ञात कारणों/भय से) जायज मामलों में भी उनका सहयोग नहीं करते हैं। ऐसे में अपमान सह कर भी चुप रहने के सिवाय एक पुलिसकर्मी के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं होता।

दिल्ली में प्रारंभिक विवाद सिर्फ पार्किंग का था और दो व्यक्तियों के बीच का था। दिक्कत बस यही थी कि उन दोनों का प्रोफेशन अलग अलग था। तब भी, चूंकि दोनों ही कानून से जुड़े प्रोफेशन में थे तो बड़ी आसानी से विवाद का कानून के मुताबिक समाधान निकाला जा सकता था।

लेकिन यहीं पर संगठित और असंगठित होने का फर्क उभर कर आया। संगठित वकीलों ने बार काउंसिल से संपर्क करने या न्यायालय में न जाकर असंगठित पक्ष के साथ मारपीट/आगजनी करते हुए स्वयं न्याय करना शुरू कर दिया, तमाम पुलिस कर्मी पीटे गये और दर्जन भर से ज्यादा पुलिस की गाड़ियां जला दी गयीं।

खैर..ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ था। समस्या का समाधान अभी भी सक्षम स्तर से किया जा सकता था, जिसके लिये माननीय उच्च न्यायालय ने मामले में हस्तक्षेप किया और दो पुलिसकर्मियों के तबादले व कुछ सिपाही/एएसआई को तत्काल सस्पेंड करने तथा खुलेआम मारपीट/आगजनी करने वाले वकीलों के विरुद्ध 6 सप्ताह तक कोई कार्यवाही न करने का अद्भुत निर्णय सुना दिया।

मेरी सामान्य बुद्धि तो यही कहती है कि अगर कोई बड़ा दो के झगड़े के बीच आता है, तो वह या तो दोनों में समझौता कराता है या फिर दोष के मुताबिक दोनों को ही सजा देता है। तो अच्छा होता कि माननीय योर आनर द्वारा दोषी पुलिस वालों पर कार्यवाही के साथ तत्समय ही प्रथमदृष्टया दोषी वकीलों के सम्बंध में उचित धाराओं में मुकदमा दर्ज करके कार्यवाही करने के आदेश दिये गये होते।

कल दिल्ली के हजारों पुलिस वालों का गुस्सा यूं ही नहीं भड़क उठा था। सरेआम अपमान, उसके बाद एकतरफा फैसला और उसके बाद सत्ताधारी पार्टी (जिसके गृह मंत्रालय के अधीन दिल्ली पुलिस आती है) के वकील प्रवक्ता द्वारा वकीलों की गुंडई को जायज ठहराने की कोशिश ने भी आग में घी डालने का काम किया।

समस्या आज की नहीं है। भारत की आजादी की लड़ाई में जनता के सभी वर्गों का समान योगदान था लेकिन आजादी के बाद सत्ता के शीर्ष पर बैरिस्टर लोगों ने कब्जा कर लिया। उसके बाद पूरी व्यवस्था ही इस तरह की बनायी गयी कि लगातार अनंतकाल तक इनका पोषण होता रहे। वकील संगठित हैं और उनमें से ही कई आगे जाकर जज बनते हैं, इसीलिये वह जजों पर दबाव बनाकर मनमाफिक निर्णय कराने में भी सक्षम हैं। भारत मे वर्तमान में जज पद चंद परिवारों की जागीर बन चुका है और उनके आसपास उन्हीं के नाते-रिश्तेदार वकीलों का गिरोह है जो पूरी व्यवस्था को अपनी मर्जी से नचा रहा है।

भारत में न्याय में देरी सबसे बड़ी समस्या है, लेकिन आजादी के बाद से आजतक वकीलों के किसी संगठन ने कभी न्याय में देरी के विरोध में कोई विरोध प्रदर्शन किया हो तो बताइये। आखिर इनसे ज्यादा भला इस समस्या के समाधान के बारे में कौन जानता है.? वास्तव में ये वकील नहीं बल्कि सही अर्थों में #विधि_व्यवसायी हैं जो जजों के साथ मिलकर पूरे देश की आम जनता के इंसाफ पर कुंडली मारे बैठे हैं।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस केहर ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वकील अनैतिक फैसले लेने के लिये जजों को धमकाते हैं। दिल्ली की घटना के बाद जस्टिस ढींगरा ने भी स्पष्ट कहा कि वकीलों ने अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर कानून को अपने हाथ में लिया है।

सबको पता है कि (हर बार की तरह) इस मामले में भी पुलिस की हार होगी। पुलिस वाले सरकारी नौकर हैं, अनुशासित बल के सदस्य हैं और उन पर वर्दी की बंदिशें हैं। अधिकांश पुलिस कर्मी निम्न मध्यमवर्ग से आते हैं और नौकरी ही उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है, उन्हें जहर का घूंट पीकर भी ड्यूटी पर वापस जाना ही होगा। लेकिन तमाम सत्ता संस्थानों के शीर्ष पर बैठे लोगों के लिये यह घटना एक #खतरे_की_घंटी जरूर है जिसे जितनी जल्दी सुन-समझ लिया जायेगा, लोकव्यवस्था के लिये उतना ही अच्छा होगा।

Wednesday, October 9, 2019

सेकुलरिज्म

अजान दो, खुल कर दो..मस्जिद से दो, मंदिर से दो, पूजा पण्डाल से दो, गौशाला से दो, अस्तबल से दो, शूकर बाड़े से दो..हमें कोई ऐतराज नहीं।

यह सेक्युलर भारत है, सबको बराबर की आजादी है। जिसका जहां मन करेगा वहां नमाज पढ़ेगा, जहां से मन करेगा अजान देगा, जहां मन करेगा, कुर्बानी देगा. इसमें किसी को कोई परेशानी नहीं।

लेकिन एक शंका है। जो अक्सर तुम गंगा-जमुनी तहजीब की बात कहते हो, उसमे ये दोनों नदियां ही हैं न.? तो तय कर लिया है तुमने, कि तुम कौन वाली नदी हो.? तुम गंगा हो या यमुना.? तुम ही बता दो पहले तो ठीक रहेगा, काहे से कि जो बचेगा हम उसी को मान लेंगे कि हम वही हैं।

लेकिन फिर एक दिक्कत होगी। अगर जो बचेगा वह हम होंगे, तब यह भी तय हो जायेया कि हम भी हैं। और अगर हम भी होंगे तब तो बिना हमारे यह संस्कृति दजला-फरात वाली ही हो जायेगी। वैसे दजला-फरात वाली भी कहीं से तुम्हारी नहीं थी, क्योंकि तब तो तुम पैदा भी नहीं हुए थे। खैर, अब तो तुम पूरी दुनियां को ही अपनी जागीर समझते हो.!

भूल गया था (यह भी तुम्हारी संगत का असर है जो हम खुद को सदियों तक भूले रहे), बात हो रही थी कि गंगा-जमुना में हम कौन हैं.? या दोनों ही तुम हो.? तुम ही तुम..केवल तुम.!

अगर हमें भी हमारी पहचान बचाये रहने देने की कृपा करो तो मेरी इल्तिजा है कि बराबरी के सिद्धांत के अनुसार हमें भी इजाजत दो कि हम भी मस्जिद भांगड़ा कर सकें, वहां भंडारा कर सकें, वहां कीर्तन कर सकें, शंख बजा सकें..

लेकिन तुम्हें यह सब पसन्द नहीं आयेगा और हो सकता है कि मेरी इस हिमाकत के बदले तुम मेरी गर्दन ही कतर डालो। क्योंकि गर्दन कतरना तुम्हारी फितरत है, बहुतों की कतर चुके हो, तो मेरी क्या औकात.? पर..तुम्हें अपने ही खुदा का वास्ता..ये सेक्युलरिज्म का फर्जी पाठ पढ़ाना बंद कर दो प्लीज..

दुर्गा-पूजा पण्डाल में नमाज/अजान देना जायज और नुसरत जहां का वहां जाना गैर-इस्लामी.! इतनी बेशर्मी लाते कहां से हो यार.?!