Monday, May 31, 2021

पिछवाड़े का कीड़ा

कीड़ा_काट रहा है क्या पिछवाड़े.? 

ये डायलॉग सबने ही कभी न कभी जरूर सुना होगा, मैंने भी सुना है.. लेकिन इस कीड़े के काटने से परिणाम क्या हो सकते हैं, इसके कुछ दिव्य उदाहरणों का मजा लीजिये-

1. अच्छा-भला राफेल_सौदा हो गया था। कांग्रेस कीड़ा काटा और बहस की मांग कर दी..

परिणाम- राजीव_गांधी के तमाम भ्रष्टाचारों की किताबें खुल गयीं और 30 सालों में बड़ी मेहनत से बनायी गयी मिस्टर_क्लीन की छवि गंध मारने लगी।

2. अच्छी-भली 370 हट गयी थी। कांग्रेस को फिर कीड़ा काटा और 370 पर बहस की मांग कर दी..

परिणाम- पीओके से लेकर चीन तक नहरू के कच्चे चिट्ठे खुल गये और 70 सालों में बना नहरू का फर्जी आभामंडल फुस्स हो गया।

3. कोरोना असफलता, पालघर लिंचिंग और सुशांत मामले के बाद भी शिवसेना और उद्धव ठाकरे की छवि जैसे-तैसे बची हुई थी। संजय_राउत को कीड़ा काटा और कंगना को गाली दे दी..

परिणाम- उद्धव_ठाकरे सहित शिवसेना के भी कच्चे चिट्ठे खुल गये। सालों से बनी हिंदुत्व की छवि सड़कछाप_गुंडागर्दी में बदल गयी और शिवसेना शवसेना बन गयी।

4. पालघर, रामजन्मभूमि, सुशांत, कंगना और तमाम मामलों में चुप्पी के बावजूद बच्चन_परिवार की लंगोट जैसे-तैसे बची हुई थी। जया को कीड़ा काटा और थाली_में_छेद वाला बयान दे दिया..

परिणाम- जिस अमिताभ पर कभी उंगली भी नहीं उठी थी, उनका हर पाखण्ड उजागर हो गया और 50 सालों में बनी महानायक की छवि महा_नालायक में बदल गयी।

5. अच्छी-भली सेकेंड_वेब कंट्रोल हो रही थी और तमाम लापरवाहियों, साइड इफेक्ट्स और दवाइयों में लूट के बाबजूद देश डॉक्टरों को वैरियर्स कह कर सम्मान दे रहा था। IMA को कीड़ा काटा और उसने आयुर्वेद के खिलाफ बयान जारी कर दिया..

परिणाम- जिस IMA पर कोई सवाल उठाने की सोच भी नहीं सकता था, उसके कच्चे चिट्ठे खुल रहे हैं। उसकी मिशनरी_उत्पत्ति और धर्मांतरण में मिलीभगत से लेकर फार्मालाबी से सांठगांठ तक के काले कारनामे कब्र से निकल रहे हैं और देश को पहली_बार पता चला कि IMA कोई सरकारी संस्था नहीं, बल्कि एक NGO है।

70 सालों तक जनता को भेड़ समझने वाले अगर नहीं समझ पा रहे हैं कि नये_भारत में इस कीड़े ने भी काटने का प्यार भरा नया_अंदाज ढूंढ लिया है, तो हम क्या कर सकते हैं.?

यही नियति_का_लोकतंत्र है..  

✍️❤️🤷‍♂️

Saturday, May 15, 2021

येरुशलम में इस्लाम खतरे में..

इस समय इजरायल और फिलिस्तीन के बीच (संभवतः इस बार निर्णायक) युद्ध चल रहा है। इजरायल या फिलिस्तीन हमारे पड़ोसी नहीं हैं.. लेकिन चाहे-अनचाहे हम इस युद्ध से प्रभावित जरूर होंगे, हो भी रहे हैं..

कितने लोग जानते हैं कि इजरायल और फिलिस्तीन के बीच विवाद का कारण क्या है.? वस्तुतः यह विवाद बिलकुल उसी तरह का है, जैसा हमारे यहां अयोध्या में शताब्दियों बाद निबटा है और काशी_मथुरा में चल ही रहा है।

यहूदियों का सबसे पवित्र धार्मिक स्थान टेंपल_माउंट येरुशलम के पुराने शहर में है। 70 ईस्वी में यहां स्थित यहूदियों के सेकेंड_टेंपल को ध्वस्त कर दिया गया और अब वहां पर अल_अक्सा मस्जिद बनी है जो इस्लाम की तीसरी सबसे पाक_मस्जिद कही जाती है। जले_पर_नमक की तर्ज पर इसी के पास बाद में इस्लामी श्राइन डोम_आफ_रॉक बनाकर उसके गुम्बद को सोने से मढ़वाया गया। 

बहुत जद्दोजहद के बाद आखिरकार यहूदियों को इसके पास स्थित वेस्टर्न_वाल के पास पूजा करने की अनुमति मिली.. लेकिन शायद यहूदी हम हिन्दुओं की तरह सहिष्णु या सेकुलर नहीं हैं। अब वह अपना अधिकार वापस लेने में सक्षम हैं और सौभाग्य से इजराइल में विपक्ष भी भारत की तरह दोगला नहीं है..

जो भी हो, फिलहाल तो येरुशलम में इजरायल ने इस्लाम_खतरे_में डाल दिया है.. देखने वाली बात ये होगी कि इस बार जेहादी कम पड़ते हैं, या फिर हूरें ही कम पड़ जायेंगी... 👍

Sunday, May 2, 2021

बंगाल चुनाव और भाजपा

★"एक बार फिर लोकतंत्र में लोगों की आस्था बनी रह गई है.."
★"ईवीएम की खराबी अब बीते दिनों की बात है.."
★"मोदी-शाह के चुनावी अश्वमेध के बगटुट घोड़े को बंगाल की दीदी ने थाम लिया है..

ऐसी कुछ हेडलाइंस, ऐसे कुछ स्लग्स, ऐसे कुछ विश्लेषण अगले 2-3 दिनों तक आपको टीवी/पेपर्स में देखने को मिलने वाले हैं।

यह चुनाव पांच राज्यों में हुए हैं, जिनमें से दो -असम और पुडुचेरी- में भाजपा पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने जा रही है, बंगाल में उसने 3 की तुलना में 75 से अधिक सीटें लेकर गजब का प्रदर्शन किया है, तमिलनाडु में दमदार शुरुआत की है और केरल में मेट्रोमैन श्रीधरन की हार के बाद भी भाजपा की धमक स्पष्ट दिखने लगी है.. लेकिन चर्चा ऐसी हो रही है, जैसे बंगाल में भाजपा की सरकार थी और ममता ने उसे छीन लिया है। वस्तुतः यह मीडिया के छद्म बुद्धिजीवियों की बनाई दुनिया थी जो भाजपा का सब कुछ बंगाल में दांव पर लगा हुआ बता रही थी। भाजपा के पास बंगाल में खोने को था ही क्या.? उसकी 3 से 75-80 सीटों की जीत प्रमाण है कि भाजपा ने बंगाल में राजनीतिक दल के रूप में गजब का प्रदर्शन किया है। रही बात प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के चुनाव प्रचार करने की ( जो कहा जा रहा है), तो क्या वह अपनी पार्टी के नेता नहीं हैं, और क्या मंत्रिपद उनको अपने दल के लिये प्रचार करने से वंचित कर देता है.?

कांग्रेस और लेफ्ट के अभूतपूर्व सफाये की कोई चर्चा नहीं कर रहा है। बंगाल में दोनों का ही खाता तक नहीं खुला और असम में तमाम दम झोंकने और मुस्लिम जेहादियों के साथ गठबंधन करने के बावजूद कांग्रेस की दाल नहीं गली है।

यह सच है कि बंगाल में दीदी एक पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रही हैं, लेकिन यह भी सच है कि नंदीग्राम के नतीजे की छाया पूरे 5 साल उनकी सरकार पर ग्रहण की तरह छायी रहेगी।

बंगाल चुनाव नतीजों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि जिन-जिन सीटों पर मुस्लिम जनसंख्या प्रभावी थी, वहां-वहां टीएमसी की जोरदार जीत हुई है। वोटों का यह बटखरा सीधे तौर पर तृणमूल के पक्ष में गया और उसने पलड़े को झुका दिया। हिंदू_वोटर हमेशा की तरह असमंजस में रहा, जबकि मुसलमानों ने हमेशा की तरह भाजपा को हराने के लिये एकजुट होकर वोट किया जिसका आह्वान भी ममता ने खुले मंच से किया था.. सोचना तो अब वहां के हिंदुओं को होगा।

चुनाव लोकतंत्र की असल कसौटी होते हैं और इसमें किसी की जीत तो किसी की हार होती ही रहती है। लेकिन बंगाल की असल चुनौती अभी आगे आनी बाकी है जिसका संकेत टीएमसी के गुंडों ने नतीजे आते ही आरामबाग में भाजपा #कार्यालय को जलाकर दे दिया है। कमीशनखोरी, तोलेबाजी और हर केंद्रीय योजना में अड़ंगा अब बंगाल का नसीब होने वाला है। 

कई चुनावों के बाद बंगाल में भाजपा के रूप में एक मजबूत विपक्ष आया है, वह हिंदुओं को कितना बचा पायेगी यह तो समय ही बता पायेगा.. लेकिन उम्मीद तो कर ही सकते हैं कि भाजपा के रहते रोहिंग्या और अवैध बांग्लादेशी वहां अब एक नया_कश्मीर नहीं बना पायेंगे।

#जय_हिंद 💐

Thursday, April 29, 2021

कोरोना की सेकेंड वेव और मोदी

फिर से शुरुआत वहीं से करूंगा कि कोरोना है और शायद रहेगा भी सुगर, बीपी व अन्य कई बीमारियों की तरह.. शंका इस कोरोना की तथाकथित सेकेंड_वेव को लेकर हो रही है कि क्या यह भारत और भारत के वर्तमान शासन के विरुद्ध सुनियोजित षड्यंत्र तो नहीं है.?

एक पखवाड़े पहले तक मैं भी इसे सेकेंड वेव ही मानता था, लेकिन जब पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की स्थिति का आकलन किया तो आश्चर्य हुआ। हमारे पड़ोसी पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान या पूरे एशिया के किसी भी अन्य देश में कोई दूसरी लहर नहीं आयी, वहां आज भी स्थितियां पहले जैसी ही हैं। 

फिर यह सेकेंड वेव का बम भारत में ही क्यूं और कैसे फटा.? क्या इन सभी एशियाई देशों -जो चिकित्सा, स्वास्थ्य और अन्य उच्चतर सुविधाओं में हमसे कमतर ही हैं- के नागरिक भारतीयों से अधिक अनुशासित हैं.? क्या वे महामारी से बचने के लिए चौबीस घंटे मास्क पहने रहते हैं.? क्या उनकी भौगोलिक स्थिति भारत से भिन्न है.? फिर यह दूसरी लहर इन देशों को छू भी नहीं सकी और भारत को तोड़ रही है, क्यूं.? 

आईसीएमआर ने पहली वेव के समय कहा था कि भारत में करोड़ों लोगों को यह बीमारी हो गयी और उन्हें पता भी नहीं चला.. तो जब करोड़ों लोग तब इसे झेल गये, फिर उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बन गयी, तब दूसरी लहर इतनी खतरनाक कैसे हो गयी, और भारत में ही क्यों हुई.? 

उत्तर आसान नहीं तो बहुत कठिन भी नहीं है.. थोड़ा सा ध्यान इस महामारी के बाद की वैश्विक परिस्थितियों पर ले जाइये। दवा, वैक्सीन से लेकर अर्थव्यवस्था प्रबंधन तक.. सबमें ही भारत ने पूरी दुनिया को चकित कर दिया था और UN से लेकर WHO तक हर कहीं भारत और मोदी की तारीफ के पुल बांधे जाने लगे थे। तो क्या चीन, पाकिस्तान और विश्व के स्वयम्भू मालिक देश इससे बहुत प्रसन्न हो गये होंगे.?

चीन आज भारत को मदद की बात कर रहा है, जबकि पिछली महामारी में वही घुसपैठ कर रहा था। पाकिस्तान जैसा चिरशत्रु जिसे खुद के खाने के लाले पड़े हैं, वह भी हमारी मदद की बात कर रहा है और अमेरिका व जर्मनी जैसे देश हमें वैक्सीन बनाने का कच्चा माल देने से मना कर रहे हैं।

असल कारण दूसरे ही हैं..

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनावों में दुनिया की ताकतवर फार्मा लाॅबी, ऑयल लाॅबी और आर्म्स लॉबी ने इस महामारी, BlackLivesMatter तथा जॉर्ज फ्लाॅयड जैसे मुद्दों का मीडिया में भयानक उफान मचाकर ट्रंप को हरवा दिया, क्योंकि ट्रंप ने इन लॉबीज के सामने खड़े होने की हिमाकत की थी। हालांकि वो बाद में झुके, लेकिन तबतक देर हो चुकी थी।

न जानते हों तो जान लें, इन फार्मा कंपनियों का सालाना बिजनेस कम से कम 4 से 6 ट्रिलियन डॉलर का होता है, जिसमें से मोदी ने लगभग 1.25 ट्रिलियन डॉलर का इनका वैक्सीन बिजनेस छीन लिया, इसके अलावा 500 बिलियन डॉलर का PPE Kit और मास्क का बिजनेस भी लगभग जीरो कर दिया। तो भारत की मेडिकल क्षेत्र में आत्मनिर्भरता कैसे.? हमेशा हाथ फैलाने वाला देश वैक्सीन बांटने वाला देश हो गया.? क्या यह आसानी से पचने वाली बात थी.? जर्मनी ने तो अपनी पीड़ा खुलकर जाहिर भी कर दी थी कि "ड्रग के क्षेत्र में भारत ने हमें कैसे पछाड़ दिया.?

कारण और भी हैं..

भारत ने वैश्विक आयल_लाबी के मुंह पर करारा तमाचा मारते हुए अगले 2-3 सालों में इलॅक्ट्रिक वाहनों के लिये 75 हजार से 1 लाख चार्जिंग स्टेशन बनाने का लक्ष्य रखा है जिससे तेल की खपत 30% तक कम हो जायेगी। हम LCA लड़ाकू विमानों और ब्रह्मोस मिसाइल का निर्यात करने लगे हैं, क्या यह वैश्विक आर्म्स_लॉबी के लिये सुखद समाचार है.?

सभी परेशान हैं..मोदी इनकी राह का सबसे बड़ा कांटा है और वह ट्रंप की तरह झुक भी नहीं रहा है, तो क्या किया जाये.? लोकतांत्रिक देश में अंतिम और सबसे सशक्त हथियार है जनता का गुस्सा और अब देश व देश के बाहर के सारे मोदी विरोधी इसी अस्त्र को आजमाने में लगे हैं।

आज की तारीख में असम और बंगाल भारत के लिये कहीं न कहीं कश्मीर से भी अधिक महत्वपूर्ण हैं, न मानिये तो गूगल पर चिकन_नेक सर्च कर लीजिये फिर टीवी, न्यूजपेपर या सोशल मीडिया कहीं भी जाइये- असम और पश्चिम बंगाल में जनता मोदी की रैलियों और प्रचार को लेकर गुस्से में दिखायी जा रही है। कोई नहीं बताता कि पश्चिम बंगाल में डेढ़ करोड़ बांग्लादेशी व रोहिंग्या और असम में भी 40 लाख घुसपैठिये मेहमान बनाये जा चुके हैं और दीदी तथा गांधी जैसे लोग उनके आधार कार्ड भी बनवा चुके हैं।

फिर से कहूंगा कि कोरोना है और सतर्क रहिये, आपकी सरकार हर समय आपके साथ है। लेकिन इस चीनी बीमारी की दूसरी लहर का आतंक मोदी को हर मोर्चे पर विफल दिखाने और देश में सिविल_वार करवाने के लिये फैलाया जा रहा है। यह चीन और भारत में छिपे बैठे उसके स्लीपर सेल -वामपंथियों और अब कांग्रेसियों- का भी खतरनाक खेल है। विपक्षनीत सरकारों की मोदी सरकार के विरुद्ध महामारी सम्बन्धी नीच राजनीति और मीडिया का 24x7 लाशें व ऑक्सीजन की कमी दिखाना इसी घिनौने षड्यंत्र का एक हिस्सा है..

एक ही मां सैकड़ों की मां बन कर हजारों बार बिना आक्सीजन के कैसे मर रही है.? भीड़ केवल शमशान में ही क्यों दिख रही है.? एक ही खाली आक्सीजन सिलिंडर तमाम जगह क्यूं दिखायी दे रहा है.? अचानक ही किसान फिर से दिल्ली में क्यूं घुसने लगे हैं.?

क्रोनोलॉजी समझिये.. यह एक और टूल किट है जो फिर से सक्रिय हुई है। जैसे ही महाराष्ट्र में वसूली कांड खुला और मोदी बंगाल जीतते लगे, सबकी फट गयी कि अब क्या होगा.? और महामारी फिर से प्रकट हो गयी। हारे हुए नकारा लोगों ने अब अपना गैंग बना लिया है जो लगातार ऐसे षड्यंत्र करते ही रहेंगे और थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद यह लड़ाई अभी चलती ही रहेगी, जबतक हम-आप ऐसे देशद्रोहियों को उनके अंतिम अंजाम तक पहुंचा कर समाप्त नहीं कर देंगे..और यह करना ही होगा, अगर अपनी अगली पीढ़ी को फिर से गुलाम नहीं बनाना है तो..

मेरे विचार से पांच_राज्यों के आने वाले चुनाव_परिणाम स्पष्ट संकेत देंगे कि मोदी भी ट्रम्प जैसे अंजाम की ओर चल पड़े हैं, या संघर्ष में अभी भी हमारी अगुआई करेंगे.?! 

जय_हिंद

Friday, April 16, 2021

कोरोना और हमारी मानसिक दृढ़ता..

यह कटु तथा स्थापित सत्य है कि कोरोना है, लगभग सबको है और शायद रहेगा भी। परंतु कोरोना से जितना डरने की आवश्यकता है, उससे कहीं अधिक इससे सावधान रहने की भी जरूरत है और इसके लिये कुछ भ्रांतियों का निराकरण आवश्यक है।

अमेरिका में मृत्युदंड प्राप्त एक कैदी पर वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग किया.. उसे बताया गया कि उसे फांसी देने की बजाय कोबरा से डसवा कर मारा जायेगा। नियत दिन पर उसके सामने एक भयानक विषधर किंग कोबरा लाया गया और कैदी की आंखों पर पट्टी बांधकर कुर्सी पर बैठा दिया गया। कैदी अपनी निश्चित मृत्यु की प्रतीक्षा में बैठा था तभी उसे एक साधारण सेफ्टी पिन चुभो दी गयी।
आश्चर्य, 2 सेकेंड में ही कैदी की तड़प कर मृत्यु हो गयी। तमाम वैज्ञानिक तब और आश्चर्यचकित रह गये जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसके शरीर में कोबरा का जहर न्यूरोटॉक्सिन पाया गया।

अब प्रश्न यह उठा कि साधारण पिन से कैदी के शरीर में  विष कहां से आया जिससे कैदी की मृत्यु हुई.? विस्तृत जांच के बाद पाया गया कि वह घातक विष मानसिक तनाव और भय के कारण स्वयं कैदी के शरीर ने ही उत्पन्न किया था।

कथासार यह है कि हमारा शरीर हमारी अपनी मानसिक स्थिति के अनुसार स्वतः पॉजिटिव और निगेटिव एनर्जी उत्पन्न करता है और तदनुसार ही हमारे शरीर में हार्मोंस पैदा होते हैं।  लगभग 90% बीमारियों का मूल कारण नकारात्मक विचारों से उत्पन्न निगेटिव एनर्जी ही होती है, इसी प्रकार सकारात्मक विचार पॉजिटिव एनर्जी उत्पन्न करते हैं जो रोगों से लड़ने में सहायक होती है। कई बार रोगी अपने विश्वसनीय डॉक्टर के- "कोई चिंता की बात नहीं है.." कह देने भर से ही स्वस्थ अनुभव करने लगता है, यह उसका डॉक्टर के प्रति विश्वास -सकारात्मक विचार- ही होता है।

तो.. कोरोना को मन से न लगायें और आंकड़ों पर न जायें। टीवी, न्यूजपेपर्स या कहीं और से कोरोना सम्बन्धी खबरें देखने, पढ़ने या पता करने से परहेज करें, क्योंकि जितनी जानकारी आपको चाहिये थी वह आप जान चुके हैं, इससे अधिक जानकारी की आपको कोई आवश्यकता नहीं हैं।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि इस महामारी में नगण्य लोगों की मृत्यु घर पर हुई है। लगभग सभी अस्पताल में ही मरे हैं और वो केवल कोरोना से ही नहीं, बल्कि इसलिये मरे हैं क्योंकि उन्हें अन्य बीमारियां भी थीं, जिनका मुकाबला वो नहीं  कर सके। इसमें भी अस्पताल का वातावरण और उससे उत्पन्न मन का भय -नकारात्मक उर्जा- प्रमुख कारण है।

5 से 80 वर्ष तक के लगभग सारे लोग निगेटिव हो चुके हैं, 65 प्रतिशत लोग व्यवस्थित हैं और देश में कोरोना वैक्सिनेशन का काम तेजी से चल रहा है। इसलिये मास्क का प्रयोग करें, स्वच्छता रखें और अपने विचार सकारात्मक रखें। दृढ़ विश्वास रखें और दूसरों को भी विश्वास दिलायें कि यह समय बीत जायेगा और अतिशीघ्र सब ठीक हो जायेगा..! 👍

#Be_Positive, #Be_Healthy 💐

Thursday, March 11, 2021

बंगाल का चुनावी खेला..

#चुनावी_खेला..

1977 में #कांग्रेस के तत्कालीन राजकुमार संजय_गांधी अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे। जनता उनसे बहुत नाराज थी और संजय गांधी को भी इसका पता था। ऐसे में जाने-माने विश्व_प्रसिद्ध पहलवान दारा_सिंह -जिनकी लोकप्रियता उस समय चरम पर थी और देश के ग्रामीण क्षेत्रों में तो उन्हें महामानव माना जाता था- को उनके पक्ष में जनसभा के लिये बुलाया गया। नाराज जनता ने दारा सिंह का इतना उग्र विरोध किया कि दारा सिंह अपना आपा खोकर मंच से कूद कर जनता की तरफ डंडा लेकर दौड़ पड़े थे, पुलिस को किसी तरह उन्हें भीड़ से बचाकर ले जाना पड़ा था। 

इसके बाद एक दिन चुनाव प्रचार कर लौट रहे संजय गांधी की कार पर अचानक #विरोधियों द्वारा गोलियां बरसा दी गयीं.. यह चुनावी_स्टंट रचा तो जनता की सहानुभूति बटोरने के लिये गया था, लेकिन इसका प्रभाव उल्टा ही पड़ा और संजय गांधी को उस चुनाव में 76 प्रतिशत के भारी अंतर से हार का मुंह देखना पड़ा था।

बंगाल में ममता_बनर्जी के साथ हुई घटना भी लगभग उसी तरह का चुनावी_ड्रामा ही है। पिटे हुए मोहरे प्रशांत_किशोर की सलाह पर ममता द्वारा अपनी खुद की गलती से हुई एक सामान्य दुर्घटना को जानलेवा_हमला बताना बंगाल के चुनावी_खेला का अबतक का सबसे विकृत प्रसंग ही कहा जा सकता है..

और ऐसा खेला ममता आज से नहीं खेल रही हैं.. पता नहीं कितनों को याद होगा, 1975 में जब लोकनायक जय प्रकाश नारायण कलकत्ता में सम्पूर्ण_क्रांति की यात्रा पर थे, तब एक लड़की ने अचानक सड़क पर उनकी कार रोक दी थी और कार की छत और बोनट पर आसुरी_नृत्य किया था..यह नृत्यांगना ममता बनर्जी ही थीं। उनके इस नृत्य ने तब के अखबारों में 3-4 दिन तक सुर्खियां बटोरी थीं और यहीं से उनकी उद्दंड तथा अराजक राजनीतिक यात्रा का प्रारंभ भी हुआ था।

लेकिन ममता भूल रही हैं कि संचार क्रांति के बाद के वर्तमान युग में जब कि विश्व के एक छोर से खबरें चंद सेकेंड में दूसरे छोर तक पहुंच जाती हैं, ऐसे हथकंडों की पोल खुलते न देर लगती है, न इनका ज्यादा असर होता है।

भाजपा ने और आश्चर्यजनक रूप से कांग्रेस ने भी ममता के साथ हुई घटना की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उचित होगा कि इस घटना की त्वरित जांच कर परिणाम से जनता को भी अवगत कराया जाये, ताकि जनता हिंसा से नहीं बल्कि वोट से चुनाव में अपना #खेला खेले और इन ढोंगियों को वक्त रहते सबक सिखा सके..

जय_हिंद 🚩

Thursday, December 3, 2020

सब्सिडी वाले करोड़पति किसान

किसान_आंदोलन..😢

सर्वप्रथम यह स्पष्ट कर दूं कि मैं किसान परिवार से ही हूं और खेती_किसानी के बारे में एक आम किसान से कहीं ज्यादा जानता हूं..और इसीलिये सीना ठोंक कर लिख रहा हूं..

पहले तो किसानों को मिलने वाली सरकारी मदद (सब्सिडी) के बारे में-

● बीज_खरीद पर सब्सिडी
● कृषि_उपकरण खरीद पर सब्सिडी
● खाद के लिये सब्सिडी
● ट्रेक्टर और ट्राली खरीद पर सब्सिडी
● पशुधन खरीद पर सब्सिडी
● खेती में अन्य खर्च के #कर्ज पर सब्सिडी
● जैविक_खेती पर सब्सिडी
● सोलर एनर्जी पर सब्सिडी
● सिंचाई के लिये बिजली/डीजल पर सब्सिडी
● बागवानी पर सब्सिडी
● सिंचाई पाईप लाईन पर सब्सिडी
● स्वचालित कृषि पद्धति अपनाने पर सब्सिडी
● जैव उर्वरक खरीद पर सब्सिडी

इसके बाद-

● फसल बीमा
● किसान क्रेडिट कार्ड
● नई तरह की खेती करने वालो को फ्री प्रशिक्षण
● कृषि विषय पर पढ़ने वाले बच्चों को अनुदान

फिर..
★ सूखे पर मुआवजा।
★ बाढ़ पर मुआवजा।
★ टिड्डी-कीट जैसी आपदा पर मुआवजा।
★ शौचालय निर्माण फ्री
★ पीने का साफ पानी फ्री
★ घर से गन्दे पानी की निकासी फ्री
★ बच्चों को पढ़ने खेलने की ट्रेनिंग फ्री

■ साल में 6000 रुपये खाते में
और
■ और..सरकार बदलते ही सारे कर्ज माफ 👍

अगर इतने के बाद भी इस देश के किसानों को सरकार से अपना हक नहीं मिल रहा, तो कब और कैसे मिलेगा ये परमात्मा भी नहीं बता सकेंगे।

कितनों को पता है कि जिस MSP के खत्म हो जाने का हौवा खड़ा कर के पंजाब और हरियाणा के तथाकथित किसान आज आंदोलन कर रहे हैं, वह MSP कभी भी देश के सभी किसानों के लिये एक समान नहीं रही है.? 

इस साल भी यूपी बिहार के किसानों को अपना धान 1100 से 1300 रू. प्रति क्विंटल में बेचना पड़ा है जबकि पंजाब और हरियाणा के किसानों को प्रति क्विंटल धान के 1888 रू. मिले हैं, मतलब इस पर भी सब्सिडी.?!

👉 यह सत्य है कि पंजाब हरियाणा के किसान गेहूं और धान की पैदावार देश के अन्य किसानों से अधिक करते हैं, लेकिन कटु सत्य यह भी है कि इस गेहूं और धान की गुणवत्ता निम्न कोटि की होती है। यह अपना गेंहू 1800 में सरकार को बेंचकर खुद 2400 में मध्यप्रदेश का गेहूं खरीदकर खाते हैं, खुली प्रतिस्पर्धा में इनकी उपज कोई नहीं खरीदेगा। 

यही भय इनको नये कृषि कानूनों का विरोध करने पर मजबूर कर रहा है क्योंकि नये कृषि कानून किसान को अपनी उपज कहीं भी खुले_बाजार में बेंचने की सुविधा देते हैं और बाजार में तो घटिया माल नहीं बल्कि क्वालिटी ही टिकती और बिकती है..

इन सब्सिडी वाले करोड़पति_किसानों से कहीं बेहतर तो देश के तमाम दिहाड़ी मजदूर, रेहड़ी वाले, छोटे वकील, पटरी दुकानदार, पढ़े-लिखे बेरोजगार, ड्राइवर और कचरा बीनकर पेट पालने वाले हैं जो रोज मेहनत करते हैं, लेकिन न रोते हैं न सरकार से सब्सिडी मांगते हैं न ही ब्लैकमेलिंग करने के लिये धरना और आंदोलन करते हैं..😢

जो सच है, वही लिखा है..किसी को बुरा लगे तो #SORRY..😢